ऊन्मुक्त

कुछ स्वछ्न्द विचार और उन्मुक्त चिन्तन

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स्थान: New Delhi, Delhi, India

बुधवार

चुनाव के दिन आये रे भैया

चुनाव के दिन आ गए फिर से. वैसे इतने बड़े देश में कोई ना कोई चुनाव तो होता ही रहता है लेकिन इस चुनाव की बात कुछ और है. लोकसभा चुनाव, चुनाव जो अगले पांच साल के लिए हमारे देश और समाज को दिशा देने वाला चुनाव. वैसे चुनाव जब होगा सो होगा लेकिन इस चुनाव से पहले से ही मैंने तयारी करना चालु  कर दिया था.

सबसे पहले घर से TV हटाया। फ़ोन पे WhatsAPP के ढेर सारे ग्रुप्स  को 'म्यूट' किया. Facebook  पे जाके अपने Friendlist की सफाई की. बहुतों को लात मार  के भगाया, चाहता तो यही था लेकिन ये विकल्प नहीं था इसलिए  Unfriend  कर के ही संतोष करना पड़ा.  ये अधिकतर वो लोग थे जिन्होंने कसम खाई है  की हर दिन ५० पोस्ट और फॉरवर्ड डालना ही डालना है. अधिकतर फॉरवर्ड्स आपको याद दिलातें हैं की अगर आप उनके द्वारा  समर्थित  दल को मत नहीं देते हैं तो दुनिया का प्रलय हो जायेगा

दूसरा बड़ा  काम था, घर से टीवी  को हटाना. टीवी  के हटतें ही जैसे दुनिया बदल गयी. घर शांत, मन शांत और दिमाग शांत.

इसके बाद  का काम था की राजनितिक बहस से बचने के लिए जिस पार्टी के समर्थक से मिलो उसी के सुर में सुर मिलाना. उसे जिस पार्टी को वोट देना है उसी  को देगा, बहस की कोई गुंजाइस ही नहीं है फिर फ़ालतू की मगजमारी  बहस क्यों करना. बेचारे को ये बोल के खुश कर दो की आप भी उसी की पार्टी को वोट दे रहे हो.

अभी तक तो मेरी तरकीब सफल है और मेरा मानसिक संतुलन बना हुआ है. आगे देखतें क्या होता है.

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रविवार

वोट दे, साष्टांग समर्पण न करें


अधिकतर लोग और हमारे नीति निर्माता गैर सरकारी संस्थायों (NGOs) की विदेशी फंडिंग का इसलिए विरोध करतें हैं की वो विदेश फंडिंग पा कर विदेश हित में काम करेंगे.. ध्यान रहे NGOs सिर्फ नीतियों को प्रभावित कर सकतें हैं, नीतियां बना नहीं सकते. लेकिन जो नीति निर्माता है, जो देश चलातें हैं उनकी विदेशी फंडिंग के बारे में बात नहीं होती है. हमारी न्यायपालिका ने जब बीजेपी और कांग्रेस दोनों के विदेशी फंडिंग में अनियमितता पायी और जांच के आदेश दिए तो इन दोनों पार्टियों ने कंधे से कन्धा मिलकर देश हित को ताखे पे रख अपने हित के लिए ऐसा बिल पास किया है  जो ना सिर्फ राजनितिक पार्टियों की विदेशी फंडिंग की अनुमति देता है बल्कि पूर्वप्रभाव (retrospection) से नियमित करता है.मतलब दोनों कोंग्रेस और बीजेपी जिनके फंडिंग में अनियमितता पायी गयी थी अब निर्दोष हो जाएँगी.
राजनितिक प्रक्रिया में वोट देना आवश्यक है इसलिए वोट दे लेकिन साष्टांग समर्पण न करें. देश भक्त बने, राजनितिक पार्टियों के सेवक न बने.
वोट दे कर हम राजनितिक पार्टियों से यह अधिकार खरीदतें है की हम उनके हरेक कदम की समीक्षा कर सकें और उनके निर्णयों पे प्रश्न उठा सकें. राजनितिक दल हमसे वोट ही नहीं हमसे हमारा साष्टांग सम्पूर्ण समर्पण चाहतें है. इसलिए नहीं की वो देश हित में काम करें, बल्कि इसलिए की जब वो अपने हित में काम करे हम सवाल न पूछें.


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